जन्म कुंडली में राजयोग का निर्माण कैसे होता है

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Untitled-1कुंडली में कुछ खास ग्रहों की युति अथवा कुछ ख़ास भावो में स्थिति ही राजयोग कहलाती है. जिस कुंडली में राजयोग का निर्माण हो रहा हो, ऐसा जातक या व्यक्ति ज़िन्दगी में लगभग सभी सुविधाओं का का उपभोग करता है. सफलता, प्रसिद्धि तथा धन की कोई कमी नहीं रहती है. जीवन वैभव से परिपूर्ण रहता है और सभी ऐशो-आराम उपलब्ध रहते है.

अगर सही अर्थो में कहा जाएँ तो राजयोग कुछ भी नहीं, सिर्फ व्यक्ति के पूर्व जन्मो का अथवा संचित कर्मो का फल होता है, जो उसे इस जन्म में प्राप्त होता है. क्रियमान कर्मो अथवा इस जन्म के कर्मो का राजयोग के निर्माण में कोई खास योगदान नहीं होता है. यह सब भाग्य का खेल होता है, और भाग्य संचित कर्मो से बनता है. जो कर्म हम जन्म-जन्मान्तर करते रहते है, वही संचित कर्म होते है.

आपने देखा होगा, अक्सर एक सामान्य से परिवार में जन्म लेने के बाद भी व्यक्ति सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित कर देता है. धीरू भाई अम्बानी भी ऐसे ही सफल और भाग्यशाली व्यक्तिओ की श्रेणी में आते है

आइये अब चर्चा करते है, कि ज्योतिष अथवा जन्म कुंडली में राजयोग का निर्माण कैसे होता है

ज्योतिष का मूल नियम है कि जब केंद्र स्थान (1,4,7,10) और त्रिकोण स्थान (1,5,9) के स्वामी ग्रह एक-दुसरे के साथ युति बनाते है, दृष्टि सम्बन्ध रखते है अथवा स्थान परिवर्तन करते है तो राजयोग की रचना होती है. कुंडली का प्रथम भाव जिसे हम लग्न भी कहते है, वह केंद्र और त्रिकोण दोनों होता है. लग्न भाव कुंडली में सबसे पहले विचारणीय होता है.

सभी चारो केंद्र स्थानों (1,4,7,10) अथवा भावो में से 4th और 10th भाव सबसे शक्तिशाली और शुभ होते है. लेकिन दशम भाव को अत्यधिक शुभ माना गया है.

इसी तरह तीनो केंद्र स्थानों (1,5,9) में से 5th और 9th  भाव उत्तम और अधिक शक्तिशाली होते है. लेकिन यहाँ भी नवम भाव को ज्यादा शुभ माना गया है.

कैसे बनता है राजयोग ?

1-      जब लग्नेश (प्रथम भाव का स्वामी ग्रह) 5th भाव में बेठे, अथवा 5th के स्वामी ग्रह के साथ युति अथवा द्रष्टि से कोई सम्बन्ध बनाये. अगर लग्नेश 5th भाव में ना हो, लेकिन पंचमेश (5th भाव का स्वामी ग्रह) ऐसा कर रहा हो तब भी राजयोग का निर्माण होगा.

2-      लग्नेश 9th भाव में बेठे, 9th के स्वामी ग्रह के साथ युति अथवा द्रष्टि से कोई सम्बन्ध बनाये.

3-      चतुर्थेश अगर पंचम या नवम भाव में बैठा हो, अथवा पंचमेश या नमेश चतुर्थ भाव में बैठे हो राशि परिवर्तन कर रहे हो, अथवा युति या दृष्टि सम्बन्ध बना रहे तो राजयोग का निर्माण होगा.

4-      सप्तम भाव का स्वामी ग्रह अगर पंचम या नवम भाव में बेठा हो, या फिर पंचमेश या नवमेश सप्तम भाव में बैठे हो, या युति या दृष्टि सम्बन्ध बना रहे तो राजयोग का निर्माण होगा.

5-      दशमेश अगर पंचम या नवम भाव में बैठा हो, अथवा पंचमेश या नमेश दशम भाव में बैठे हो राशि परिवर्तन कर रहे हो, अथवा युति या दृष्टि सम्बन्ध बना रहे तो राजयोग का निर्माण होगा.

6-      वैसे तो ऊपर दी हुई सभी स्थितिओ में राजयोग का निर्माण होगा, लेकिन लग्नेश और नवमेश अथवा दशमेश और नवमेश के द्वारा बनाया हुआ राजयोग सर्वश्रेष्ट और सबसे उत्तम फल देने वाला माना गया है.

7-      राजयोग का निर्माण अगर केंद्र या त्रिकोण भावो में हो रहा हो, तो जातक को सम्पूर्ण जीवन में राजयोग के अच्छे फल मिलते रहते है.

8-      अगर राजयोग का निर्माण 6, 8, 12 भावो में हो रहा हो तो यह राजयोग क्षणभंगुर होता है. जातक को राजयोग के फल तो मिलते है, लेकिन बहुत कम समय के लिए और कभी-कभी.