प्रभव मंथन

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पुरुषों के लिए मर्यादा

‘मातृवत् परदारेषु’ अर्थात् पराई स्त्री को माता समझो। यह नीति कथन पुरुषों के लिए मर्यादा निर्धारित करता है। मर्यादा और अमर्यादा के बीच मात्र एक झीनी-सी दीवार होती है। एक ओर का मर्यादित आचरण उसे देवतुल्य बना देता है, जिसे समाज युगों-युगों तक याद रखता है। उसे ताज की तरह अपने सिर पर बिठाता है और उसके उदाहरण देता है।

इसके विपरीत दूसरी ओर का अमर्यादित आचरण उसे दानव बना देता है, जिसे समाज के लोग हिकारत की नजर से देखते हैं। वह समाज व न्याय व्यवस्था का दोषी बनकर सारी आयु सजा भोगता है। उसके साथ ही उसके अपने निर्दोष होते हुए भी उसकी गलतियों की बलि चढ़ जाते हैं। कोई भी उनसे सम्बन्ध नहीं रखना चाहता। उन्हें कहीं, किसी पार्टी आदि में भी बुलाना अपनी नैतिकता के विरुद्ध समझते है। एक व्यक्ति के ऐसे अमर्यादित आचरण के कारण उन सबका सामजिक बायकाट हो जाता है।

स्त्री से सतीत्व की अपेक्षा रखने वाले पुरुष से भी यही आशा की जाती है कि वह अपने आचार-व्यवहार पर अंकुश रखे। यदि वह अपनी पत्नी में भगवती सीता का प्रतिरूप देखना चाहता है तो उसे स्वयं भी राम जैसा एकपत्नी व्रत धारण करना होगा। इसी तथ्य को निम्न श्लोकांश में इस प्रकार कहा है –
सत्यार्जवं चातिथिपूजनं च
धर्मस्तथार्थश्च रति:स्वदारै:।
अर्थात् गृहस्थ पुरुष सत्य और सरलता का पालन करे। अतिथिपूजा, धर्म, अर्थ के कार्य करे और अपनी स्त्री में अनुराग रखे।
सत्य और सरलता का व्यवहार करना मात्र स्त्री का धर्म नहीं पुरुष का भी है। इसी प्रकार अतिथि सत्कार करना भी दोनों ही का दायित्व है। सभी धार्मिक कार्यों में दोनों की उपस्थिति अनिवार्य होती है। अश्वमेध यज्ञ के समय सीता जी की अनुपस्थिति में भगवान राम ने उनकी स्वर्ण प्रतिमा रखी थी। एवंविध घर-गृहस्थी के आर्थिक मामलों में भी दोनों की स्वीकृति होने से बड़ा और कुछ भी श्रेष्ठ नहीं होता।
हमारे महान मनीषियों ने सदा ही यह उपदेश दिया है कि पुरुष केवल अपनी पत्नी का ही होकर रहे। इस प्रकार समाज में व्यभिचार नहीं फैलता। व्यक्ति बहुत-सी सम्भावित बिमारियों से ग्रसित होने से बच जाता है।
अपनी पत्नी के लिए एक पुरुष बहुत संवेदनशील होता है। वह नहीं चाहता कि उसकी पत्नी उसके अतिरिक्त किसी अन्य पुरुष की ओर नजर उठाकर न देखे अथवा वह किसी अन्य से कोई सम्बन्ध रखे। फिर अपने लिए भी उसे ऐसा ही सोचना चाहिए कि यदि वह किसी अन्य महिला को नजर उठाकर देखेगा या उससे सम्बन्ध बनाएगा तो उसकी पत्नी को यह बिल्कुल अच्छा नहीं लगेगा। तब उस पत्नी के मन में उसके लिए नफरत और क्रोध का होना स्वाभाविक होता है।
पत्नी के इस अप्रत्याशित बदले हुए व्यवहार पर शिकायत करना अथवा भला-बुरा कहने का ऐसे दुराचारी व्यक्ति को कोई हक नहीं होता। उसे सबसे पहले अपने गिरेबान में पहले झाँककर देखना चाहिए, उसके बाद ही उसे बोलने या कुछ कहने का अधिकार होता है।
स्त्री के लिए यदि शास्त्र मर्यादाओं की रेखा खींचते हैं तो पुरुष के लिए भी उन्होंने संयमित और मर्यादित जीवन जीने का विधान बनाया है। अपनी सीमाओं को लाँघने का हक शास्त्र किसी व्यक्ति को नहीं देते, फिर वह चाहे पुरुष हो या स्त्री। उन नियमों का पालन करते हुए पुरुष को अपने जीवन में आगे कदम बढ़ाना चाहिए। अपने एकनिष्ठ जीवन जीने की मर्यादा का निर्वाह पुरुष को सच्चाई और ईमानदारी से करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद (लेखिका)