क्षिप्रा

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kshipraभगवान महाकाल इस दिव्य नगरी में भाग्य विधाता तथा सम्पूर्ण विश्व के आराध्य हैं  तो माँ क्षिप्रा मोक्षदायिनी कहलाती हैं क्योंकि इसके पावन जल में स्नान करने से दान, जप, होम, स्वाध्य, पितृ – तर्पण आदि करने से मनुष्य को आधि – दैनिक, आधि – भौतिक और आध्यात्मिक तीनों प्रकार के पापों से मुक्ति मिलती हैं सहस्त्रों अश्वमेघ यज्ञ के हि समान अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है । क्योंकि वेदो में भी कहा गया है कि –

तस्माद्वशगुना क्षिप्रा पवित्रा पापनाशिनी ।

ईदृशां च नदी रम्या अवन्त्यां मुविवर्तते ॥ 

अवन्त्यां च विशेषण क्षिप्रा – उत्तरवाहिनी ॥

अर्थात – वापी ताडगादी में स्नान की अपेक्षा किसी भी नदी में स्नान का पुण्य  दस गुना होता है, इससे दस गुना पुण्य गोदावरी में स्नान से प्राप्त होगा, गोदावरी में स्नान से दस गुना अधिक पुण्य नर्मदा और गंगा में स्नान से प्राप्त होगा परन्तु इन सभी से कई करोड़ो गुना स्नान का पुण्य अवंतिका में बहने वाली भगवान शिव की प्रिय नदी ‘ क्षिप्रा ‘ में प्राप्त होगा । साथ ही यह भी संकेत किया गया है कि – सर्वेषामेव दानानां दीपदान प्रश्यसते – अर्थात इस नदी में दान किये गए दीपों का प्रकाश स्वर्ग का मार्ग प्रकाशित करता है ।

आज्ञाचक्र स्मृता काशी या बाला  श्रृमिमूर्धनि । स्वाधिष्ठान स्मृतां काञ्ची, मणिपुरमवन्तिका ॥

अतः अवंतिका को मणिपूरक चक्र (नाभि – प्रदेश) के रूप में दर्शाया गया है, जिसके अधिदेवता सम्पूर्ण ब्रम्हाण के नायक स्वयं राजाधिराज बाबा महाकाल हैं ।

सिक्खों के आराध्या पूज्य गुरुनानक देव जी ने भी इस पवित्र भूमि पर रह कर क्षिप्रा  के पावन तटों पर तीन शब्दों की रचना कि थी, वहाँ कवि कालिदास ने अपनी रचना ‘ मेघदूत ‘ में मेघों को बाबा महाकाल की आरती के समय जयघोष करने का निवेदन किया । संत रविदास जी ने भी माँ क्षिप्रा के जल का पान  किया था ।

मत्स्यपुराण तथा शतरुद्र संहिता के अनुसार ब्रह्मा जी के अहंकार  को नष्ट करने के लिए शिवजी के तृतीय नेत्र से उत्पन्न रुद्रावतार भैरव ने काल को भी परास्त कर ब्रह्मा जी के पाँचवे सर का खण्डन किया, जिससे उन्हें ब्रह्म हत्या का दोष लगा उन्होंने ब्रह्मा जी के कपाल से रक्त, माँस व मदिरा का भक्षण करना प्रारम्भ किया ब्रम्हाण में सभी जगह उनका तिरस्कार होने पर भगवान शिव ने उन्हें महाकाल वन में स्थान देकर उन्हें ब्रह्म हत्या से मुक्त किया, वर्तमान में भी बाबा कालभैरव का प्राचीन मंदिर क्षिप्रा तट पर स्थित है और बाबा को आज भी मदिरा का भोग लगाया जाता है ।

विश्व के ५२ शक्तिपीठों में एक माँ हरसिध्दि का मंदिर जहाँ पर सती कि कोहनी गिरी थी, आज भी वही अप्रतिम तेजस्वी प्रतिमा जिसका तेज सहस्त्र सूर्यों के प्रकाश से भी अधिक है वह श्री यंत्र पर विराजमान है । श्री यन्त्र से तात्पर्य जिसकी पूजा से समस्त प्रकार की दैवीय सिद्धि की प्राप्ति हो, इसमें मुख्य रूप से ९८ शक्तियों का अर्चन होता है, ये शक्तियां सम्पूर्ण ब्रम्हाण को नियंत्रित करती है । सर्वप्रथम साधक इन शक्तियों का अर्चन कर अपने शरीर में मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार और इन्द्रियों पर नियंत्रण पाता है, फिर बाहय जगत पर भी नियंत्रण कर की सामर्थ्य कर सकता है ।

इसी प्रकार श्री यन्त्र और देह की भी एकता है, सिद्धिगत साधक अपने शरीर को ही श्री यन्त्र के रूप में भक्ति कर लेता है । इससे श्रापानुग्रह शक्ति प्राप्त होती है । श्री यंत्र के पूजन से साधक को अनेक सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं तथा उनकी सभी व्याधियाँ व दरिद्रता का निवारण होकर स्थिर लक्ष्मी की प्राप्ति होती है । इसके साथ ही उज्जैन को सम्पूर्ण राष्ट्र की धार्मिक राजधानी भी कहा गया है क्योंकि यहॉँ ७ वार और ८ त्यौहार है सभी राष्ट्रीय त्योहारो के साथ विशेष तिथियों पर भी कई धार्मिक मेलों का आयोजन होता है । जिसमे दूर – दूर से श्रद्धालु आकर क्षिप्रा में स्नान करते है, दान, तर्पण इत्यादि करते है तथा देवालयों में दर्शन कर अपना जीवन सार्थक करते है जैसे मकर संक्रांति, शिवरात्रि, प्रत्येक माह की पूर्णिमा, एकादशी, चतुर्दशी, प्रदोष, अमावस्या आदि ।

सिहस्थ – इन सभी स्नानो में प्रमुख है प्रत्येक १२ वर्षों में होने वाले सिहस्थ का शाही स्नान ।

सिहस्थ के बारे में कहा गया है –

मेष राशि गते सूर्ये सिंह राश्यां बृहस्पतौ ।

अवंतिकायां भवेत्कुंभ सदामुक्ति प्रदायकः ।

अर्थात – दस महायोगो के एकत्रित होने पर स्नान करने से मुक्ति का फल प्राप्त होता है, जब सूर्य मेष राशि तथा बृहस्पति सिंह राशी में आते है तब अवंतिका में क्षिप्रा नदी में स्नान, दान आदि मुक्ति कारक होगा ।

साथ ही पुराणों में वर्णन है कि –

सिंह राशि गते जीवे मेषस्थे च दिवाकरे । तुला राशि गते चन्द्रे स्वाति नक्षत्र संयुते ।

सिद्धीयोगे समायाते पंचात्या योगकारकः । योगे समायाते स्नान दानादिका क्रिया ।

विश्व के सबसे विशाल मेले में सम्मिलित होने के लिए दूर – दूर से सनातन धर्मी आते है और पुरे माह के लिए सांसारिक मोह – माया का त्याग कर स्वयं को देवता रूपी साधु – संतो की सेवा में समर्पित कर देते है । इस एक माह में विभिन्न आध्यात्मिक क्रियाओं द्वारा ब्रह्मा प्राप्ति के लिए कि  गई साधनाऐ मानव जीवन में नई ऊर्जा, उत्साह, व उमंग भर देती है ।

धर्म की रक्षा का बीड़ा उठाने वाले विभिन्न सम्प्रदाय के संत जिनमे प्रमुख रूप से शंकराचार्य, महामंडलेश्वर, अखाड़ों के नागा साधु, रामानन्दी महन्त, वैष्णव सम्प्रदाय के संत अपनी साधुमण्डली व सैकड़ों, हजारों अनुयायियों के साथ अपनी प्राचीन परम्परा का निर्वाह करते है ।

पौराणिक कथा के अनुसार अमृत की प्राप्ति के लिए देवता और दानवो ने समूह का मंथन किया कई दिनों के पश्चात इन्द्र के पुत्र जयंत समुद्र में से अमृत का कलश लेकर प्रकट हुए , अमृत कलश को प्राप्त करने के लिए देवता व दानवो में भयंकर युद्ध हुआ कहते है यह युद्ध देवताओं के 12  दिन अर्थात मनुष्य के 12 वर्षों तक चला इसी बीच 4 – 4 वर्ष के अंतराल से अमृत की 4 बुँदे पृथ्वी के चार तीर्थों पर गिरी वे तीर्थ है – 1. हरिद्वार 2. प्रयाग 3. नासिक 4. अवंतिका । ये चारों तीर्थ सम्पूर्ण विश्व के प्रधान तीर्थ कहलाते है एवं इनमे बहने वाली नदियाँ क्रमशः गंगा, गोदावरी, क्षिप्रा आदि पृथ्वी की जीवन रेखा कहलाती है । कहते है कुम्भ पर्व के समय इन नदियों में स्वयं अमृत बहता हैं जिसमे सभी देवी – देवता आकर स्नान करते है । इसलिए करोड़ो श्रद्धालु दूर – दूर  से  इस पावन मेले में आते है स्नान, दान, तर्पण करते है और देवता रूपी साधु – संतो का आशीर्वाद लेकर अपना जीवन सफल बनाते है । कुम्भ मेले के बाद भी इस अवन्ति नगरी में वर्षभर विभिन्न तिथियों में अनेक स्नान आते है जैसे – सोमवती अमावस्या, कार्तिक पूर्णिमा निर्जला एकादशी इत्यादि ।

क्षिप्रा नदी के तट पर स्थित घाट

क्षिप्रा नदी के किनारे स्नान के लिए कई घाट निर्मित हैं। श्रीराम घाट को राम घाट के नाम से भी जाना जाता है। यह सबसे प्राचीन स्नान घाट है, जिस पर कुम्भ मेले के दौरान श्रद्धालु स्नान करना अधिक प्रधानता देते हैं। यह हरसिद्धि मंदिर के समीप स्थित है। प्रत्येक बारहवें वर्ष में, कुम्भ मेले के दौरान शहर से लगे हुए घाटों का विस्तार हो जाता है और शुद्धता, स्वच्छता की देवी क्षिप्रा की हजारों श्रद्धालुओं द्वारा पूजा की जाती है।

 

त्रिवेणी घाट

क्षिप्रा तट पर स्थित त्रिवेणी घाट का नवग्रह मन्दिर तीर्थयात्रियों के लिए आकर्षण का एक प्रमुख केन्द्र है। त्रिवेणी घाट पर ही क्षिप्रा-खान (खान नदी) का संगम है। इन्दौर के लोग खान नदी को विभिन्न नामों से जानते हैं। क्षिप्रा नदी के जल को स्वच्छ रखने के उद्देश्य से खान नदी के दूषित जल को इसमें मिलने नहीं दिया जाता है।

 

 

गऊ घाट

देश के श्रद्धालुओं को एक साथ स्नान घाटों पर लाने के लिए सिंहस्थ महाकुम्भ एक प्रमुख आकर्षण है। सिंहस्थ महाकुम्भ के दौरान लाखों श्रद्धालु विभिन्न घाटों पर एकत्रित होते हैं। श्रीराम घाट और नरसिंह घाट उज्जैन के प्राचीन और पवित्र स्नान घाट हैं। धार्मिक महत्व के अलावा उज्जैन के घाट संध्या और प्रातः काल टहलने के लिए भी एक आकर्षक स्थल के रूप में जाने जाते हैं। यह घाट चिंतामन रोड पर वेधशाला के समीप स्थित है।

 

मंगल नाथ घाट

यह घाट प्रसिद्ध मंगलनाथ मन्दिर के पुल के पास क्षिप्रा नदी के दायें एवं बायें किनारे पर स्थित है। सिंहस्थ महाकुम्भ पर्व एवं धार्मिक पवित्र नहान पर आने वाले श्रद्धालुओं के स्नान हेतु इस घाट का निर्माण किया गया है। यह तीनों घाट मंगलनाथ मन्दिर के निकट ही स्थित है।

 

 

दत्त अखाड़ा घाट

यह घाट उज्जैन बड़नगर मार्ग पर छोटी रपट के बायीं तरफ शिप्रा नदी के बांये किनारे पर स्थित है। सिंहस्थ महाकुंभ पर्व एवं धार्मिक पवित्र नहान पर आने वाले श्रद्धालुओं के स्नान हेतु घाट का निर्माण किया गया है। इस घाट पर पहुँचने के लिए उज्जैन बड़नगर मार्ग पर छोटी रपट के बायीं ओर से रास्ता जाता है।

 

 

चिन्तामण घाट

यह घाट उज्जैन चिन्तामण मार्ग पर स्थित सड़क के बड़े पुल के पास रेलवे के लालपुल के नीचे क्षिप्रा नदी के बाँये किनारे पर स्थित है। सिंहस्थ महाकुम्भ पर्व एवं धार्मिक पवित्र नहान पर आने वाले श्रद्धालुओं के स्नान हेतु घाट का निर्माण किया गया है। घाट पर पहुँचने हेतु उज्जैन चिन्तामण मार्ग पर बड़े पुल के पास से दायीं तरफ से सीमेण्ट कांक्रीट रास्ता जाता है जिसकी लम्बाई 50 मीटर है।