कालसर्प दोष है क्या ?

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kalsarp doshकालसर्प दोष है क्या , कालसर्प दो शब्दों से मिलकर बना है-काल और सर्प। जब सूर्यादि सातों ग्रह राहु(सर्प मुख) और केतु(सर्प की पूंछ) के मध्य आ जाते हैं तो कालसर्प योग बन जाता है। जिसकी कुण्‍डली में यह योग होता है उसके जीवन में काफी उतार चढ़ाव और संघर्ष आता है। इस योग को अशुभ माना गया है।पौराणिक कथा के अनुसार सागर मंथन के समय देवताओं और दानवों में एक समझौता हुआ जिसके तहत दोनों ने मिलकर सागर मंथन किया। इस मंथन के दौरान सबसे अंत में भगवान धनवन्तरी अमृत कलश लेकर प्रकट हुए। अमृत पाने के लिए देवताओं और दानवों में संघर्ष की स्थिति पैदा होने लगी। भगवान विष्णु तब मोहिनी रूप धारण करके उनके बीच प्रकट हुए और देवताओं व दानवों को अलग अलग पंक्तियों में बैठाकर अमृत बांटने लगे। अपनी चतुराई से मोहिनी रूप धारण किये हुए भगवान विष्णु केवल देवताओं को अमृत पिला रहे थे जिसे दानव समझ नहीं पा रहे थे परंतु स्वरभानु मोहिनी की चतुराई का समझकर देवताओं की टोली में जा बैठा। मोहिनी ने स्वरभानु को देवता समझकर उसे भी अमृत पान करा दिया परंतु सूर्य और चन्द्रमा ने उसे पहचान लिया तब विष्णु ने सुदर्शन चक्र से स्वरभानु का सिर धड़ से अलग कर दिया। चुंकि अमृत स्वरभानु के जीभ और गर्दन को छू गया था अत: वह सिर कट जाने पर भी जीवित रहा। ब्रह्मा जी ने स्वरभानु से कहा कि तुम्हारा सिर राहु के नाम से जाना जाएगा और धड़ जो केतु के रूप में जाना जाएगा। सूर्य और चन्द्रमा के कारण ही उसे इस स्थिति से गुजरना पड़ा था इसलिए वह उसे अपना शत्रु मानने लगा। कहते हैं कि राहु केतु सूर्य और चन्द्रमा को निगल लेता है जिससे सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण होता है। राहु केतु में एक एक दूसरे से सातवें घर में स्थित रहते हैं और दोनों के बीच 180 डिग्री की दूरी बनी रहती है। ये सदैव वक्री रहता है।

अमावस्या के दिन सूर्य और चन्द्र दोनों आमने सामने होते हैं उस समय राहु अपना काम करता है जिससे सूर्य ग्रहण होता है। उसी प्रकार पूर्णिमा के दिन केतु अपना काम करता है और चन्द्रग्रहण लगता है। विष्णु को सूर्य भी कहा गया है जो दीर्घवृत्त के समान हैं। राहु केतु दो सम्पात बिन्दु हैं जो इस दीर्घवृत्त को दो भागों में बांटते हैं। इन दो बिन्दुओं के बीच ग्रहों की उपस्थिति होने से कालसर्प योग बनता है जो व्यक्ति से संघर्ष कराता है।

सूर्यादि सातों ग्रह अगर राहु और केतु के मध्य हो तब यह योग बनता है। अगर ग्रह केतु और राहु के मध्य हो तो काल सर्प योग नहीं माना जाएगा। कालसर्प योग के विचार में ध्यान देने वाली बात यह भी है कि सभी ग्रह एक अर्धवृत्त के अंदर होने चाहिएं। यदि कोई ग्रह एक डिग्री भी बाहर है तो यह योग नहीं बनेगा। इसको अशुभ योग मानते है। कुण्‍डली में कालसर्प योग के अतिरिक्‍त सकारात्‍मक ग्रह अधिक हों तो व्‍यक्ति उच्‍चपदाधिकारी भी बनता है, परन्‍तु एक दिन उसे संघर्ष अवश्‍य करना पड़ता है। यदि नकारात्‍मक ग्रह अधिक बली हों तो जातक को बहुत अधिक संघर्ष करना पड़ता है।

यदि आपकी कुण्‍डली में कालसर्प दोष है तो घबराएं नहीं, इसका उपाय किसी योग्‍य दैवज्ञ से पूछ लें और सदैव सकारात्‍मक विचारों को प्रश्रय दें।