नवरात्रि मे घट स्थापना की विधि

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ghatasthapana-navratri-puja-1459155646माता दुर्गा की आराधना के पर्व नवरात्रि के पहले दिन माता दुर्गा की प्रतिमा तथा घट स्थापना की जाती है। इसके बाद ही नवरात्रि उत्सव का प्रारंभ होता है। माता दुर्गा व घट स्थापना की विधि तथा शुभ मुहूर्त का वर्णन इस प्रकार है :

पवित्र स्थान की मिट्टी से वेदी बनाकर जौ और गेहूं बोएं। फिर वहां अपनी शक्ति के अनुसार बनवाए गए सोने, तांबे अथवा मिट्टी के कलश की विधिपूर्वक पूजा करें। कलश के ऊपर सोना, चांदी, तांबा, मिट्टी, पत्थर य चित्रमयी मूर्ति की प्रतिष्ठा करें। मूर्ति यदि कच्ची मिट्टी, कागज या सिंदूर आदि से बनी हो और स्नानादि से उसमें विकृति आने की संभावना हो तो उसके ऊपर शीशा लगा दें। मूर्ति न हो तो कलश के पीछे स्वस्तिक और उसके दोनों कोनों में दुर्गाजी का चित्र पुस्तक तथा शालिग्राम को विराजित कर भगवान विष्णु का पूजन करें। पूजन सात्विक हो, राजस या तामसिक नहीं, इस बात का विशेष ध्यान रखें।

नवरात्रि व्रत के आरंभ में स्वस्तिक वाचन-शांति पाठ करके संकल्प करें और सर्वप्रथम भगवान श्रीगणेश की पूजा कर मातृका, लोकपाल, नवग्रह व वरुण का सविधि पूजन करें। फिर मुख्य मूर्ति का षोडशोपचार पूजन करें। दुर्गा देवी की आराधना-अनुष्ठान में महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती का पूजन तथा श्री दुर्गा सप्तशती का पाठ नौ दिनों तक करना चाहिए।

इस आसान विधि से करें मां दुर्गा की आरती

आज से शारदीय नवरात्रि का प्रारंभ हो रहा है। हिंदू धर्म में प्रत्येक धार्मिक कर्म-कांड के बाद भगवान की आरती करने का विधान है। देखने में आता है कि व्यक्ति जानकारी के अभाव में अपनी इच्छानुसार भगवान की आरती करता है, जबकि आरती के कुछ विशेष नियम होते हैं। विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि देवताओं के सम्मुख चौदह बार आरती उतारनी चाहिए। चार बार चरणों पर से, दो बार नाभि पर से, एक बार मुख पर से तथा सात बार पूरे शरीर पर से आरती करने का नियम है। आरती की बत्तियां 1, 5, 7 अर्थात विषम संख्या में ही बत्तियां बनाकर आरती की जाना चाहिए।

* घटस्थापना हमेशा शुभ मुहूर्त में करनी चाहिए।

* नित्य कर्म और स्नान के बाद ध्यान करें।

* इसके बाद पूजन स्थल से अलग एक पाटे पर लाल व सफेद कपड़ा बिछाएं।

* इस पर अक्षत से अष्टदल बनाकर इस पर जल से भरा कलश स्थापित करें।

* इस कलश में शतावरी जड़ी, हलकुंड, कमल गट्टे व रजत का सिक्का डालें।

* दीप प्रज्ज्वलित कर इष्ट देव का ध्यान करें।

* तत्पश्चात देवी मंत्र का जाप करें।

* अब कलश के सामने गेहूं व जौ को मिट्टी के पात्र में रोंपें।

* इस ज्वारे को माताजी का स्वरूप मानकर पूजन करें।

* आखिरी दिन ज्वारे का विसर्जन करें।