सेक्स ज्ञान

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रिलेशनशिप लाइफसेक्स वह क्रिया है जिससे इस संसार में सभी जीवों की उत्पत्ति होती है। सेक्स-की-इच्छा तथा उत्तेजना  सभी जीवों में होती है लेकिन केवल मनुष्य ही एक ऐसा जीव है जो सेक्स की गहराइयों को समझ पाया है और इसका कारण है मनुष्य में मानसिक इच्छा, कल्पना और भावनाओं का होना। सेक्स मानव जीवन का अभिन्न अंग है और इस किसी भी स्थिति में मानव जीवन से अलग नहीं किया जा सकता और यदि ऐसा कर दिया जाए तो कुछ वर्षों में ही इस संसार से मानव जाति का नामों निशान मिट जाएगा।

इस संसार में मानव जाति के अस्तित्व के लिए दो बातें मुख्य हैं- जीवन रक्षा और वंश वृद्धि। मनुष्य अपने जीवन की रक्षा के लिए विभिन्न प्रकार के खास-गुण-वाले खाद्य-पदार्थों का उत्पादन करते हैं ताकि इनसे अपना पेट भर सके और जीवन व्यतीत कर सके। वंशवृद्धि के लिए प्रकृति ने स्त्री-पुरुष दोनों के अन्दर एक-दूसरे के प्रति आकर्षण बनाया है और दोनों के शरीर में एक अदम्य सृजन शक्ति या कामवासना भर दी है जिससे स्त्री-पुरुष में कामवासना उत्पन्न सेक्स क्रिया को अत्यंत ही आनन्ददायक बना दिया है। यदि यह क्रिया इतनी आनन्ददायक न होती तो स्त्री-पुरुष में यौन समागम नहीं होता है और आज पृथ्वी पर मानव का निशान तक नहीं होता है

पुराने समय में जब मनुष्य केवल भोजन की खोज में पूरे दिन भटकते रहते थे वही आज मनुष्य पहले की अपेक्षा कम मेहनत करके भी अच्छा और पौष्टिक भोजन प्राप्त कर लेता है। इस तरह पौष्टिक भोजन मिलने और समय की अधिकता के कारण मनुष्य अपना समय व्यतीत करने के लिए मनोरंजन का साधन ढूंढता रहता है जिसके फलस्वरुप आज के मानव समाज में कामवासना बढ़ रही है। आज कम मेहनत और समय की अधिकता के कारण मनुष्य का यौन जीवन अधिक कलात्मक और मधुर बनता जा रहा है।

 

आज कुछ लोग सेक्स को भोग-विलास और मनोरंजन का साधन मानने लगे हैं जिसके कारण वे सेक्स की वास्तविकता से भटकते जा रहे हैं और अनेक प्रकार की समस्याओं में अपने को फंसाते जा रहे हैं।

प्राचीन काल के ऋषि-मुनियों ने सेक्स के विषय पर उपदेश देते हुए कहा है कि सेक्स सृष्टि निर्माण और जीवन वृद्धि का मात्र एक साधन है किंतु इस साधन को अपना जीवन केन्द्र बना लेना उचित नहीं है। यह एक ऐसी शक्ति है जिसे मनुष्य अपनी इच्छाओं के अनुसार किसी भी दिशाओं में मोड़ सकता है। यह सही है कि कामवासना रोकने से मनुष्य अनेकों मानसिक रोगों का शिकार हो जाता है परंतु इस पर उचित रूप से नियंत्रण रखकर जीवन को उन्नति के रास्ते पर ले जाया जा सकता है। कामवासना पर नियंत्रण रखकर व्यक्ति अपने जीवन के आनन्द को प्राप्त कर सकता है।

 

स्त्री-पुरुष या पति-पत्नी के बीच प्यार और प्यार की परिभाषा अनेक रूपों में व्यक्त होती है। सेक्स विचारक प्यार की परिभाषा देते हुए कहते हैं कि आंखों द्वारा स्त्री-पुरुष के बीच आकर्षण उत्पन्न होता है, शब्दों द्वारा प्यार बढ़ता है और स्पर्श से प्यार नवीन बनता है। प्रेमियों के आंखों से निकलने वाली भाषा हृदय पर कोमल आलेख अंकित करती है। प्रेमयुक्त भावनाएं व संवेदनाएं साफ पानी की धारा के समान बहती हुई आसपास की मरुभूमि की शुष्कता को सत्यम शिवम सुन्दरम में बदल डालती हैं यही कारण है कि स्त्री – पुरुष, नर – मादा तथा पति – पत्नी के बीच सेक्स क्रिया को इतना अधिक महत्व दिया गया है। इस विषय पर गहन अनुसंधान हुए हैं।

कामकला की रसायनशालाः

मनुष्य की सभी शारीरिक कार्यों का मस्तिष्क द्वारा ही होता है। मस्तिष्क द्वारा भेजे गए किसी भी सूचना को सूचना तंत्र अर्थात स्नायु-प्रणाली शरीर के विभिन्न अंगों को भेजता है। सेक्स के प्रति मन में किसी भी प्रकार की उत्पन्न भावनाओं का कारण भी मस्तिष्क ही होता है। सेक्स क्रिया में जो आनन्द मिलता है वह मानसिक होता है क्योंकि कई बार सेक्स क्रिया के दौरान शारीरिक संतुष्टि मिल जाने पर भी मानसिक संतुष्टि नहीं मिलती जिसका परिणाम स्त्री-पुरुष दोनों में देखा जा सकता है। मस्तिष्क में सेक्स इच्छा उत्पन्न होकर सुषुम्ना नाड़ी के द्वारा जननेन्द्रियों तक पहुंचकर उन अंगों को उत्तेजित करता है। अतः यह कहा जा सकता है कि मस्तिष्क में सेक्स की भावना उत्पन्न होने पर ही जननेन्द्रियों में उत्तेजना आ पाती है। मन में सेक्स की तीव्र इच्छा के बिना सेक्स संबंध नहीं बनाया जा सकता है।

 

शरीर विज्ञान के अनुसार मनुष्य के आंखों के ठीक पीछे मस्तिष्क में एक विशेष केन्द्र स्थिति होता है जिसे लिम्बिक तंत्र कहते हैं। शरीर विज्ञान का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि आंखों के पीछे स्थित इस लिम्बिक तंत्र में कई केन्द्र होते हैं जो हमारे द्वारा देखे, सुने और अंगों द्वारा किए गए अनेक क्रियाओं, भावनाओं, इच्छाओं, अनुभूति, उत्तेजना और व्यवहारों को नियंत्रित करते हैं। इसलिए ऐसा माना जाता है कि यह तंत्र ही हमारे शरीर की सभी क्रियाओं को प्रभावित करती हैं और इस तंत्र में जरा सा विकार पैदा होते ही मन की सभी भावनाएं सेक्स की भावना के साथ ही प्रभावित होने लगती हैं।

मस्तिष्क में स्थित इस लिम्बिक तंत्र का एक प्रमुख केन्द्र है जिसे अंग्रेजी में हायपोथेलेमस और योग में आज्ञाकेन्द्र कहते हैं। मस्तिष्क में स्थित यह केन्द्र हमारी भावनाओं और मानसिक संवेदनाओं के प्रति अति संवेदनशील होता है। इस केन्द्र के बीच में कोशिकाओं का एक विशेष समूह स्थित होता है जिसे सेक्स संबंधी केन्द्रक (Sex Nuclei) के नाम से जाना जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार कामवासना (Sex desire) की उत्पत्ति इसी केन्द्रक से होती है। मस्तिष्क के इस केन्द्र में जैसे ही सेक्स की इच्छा उत्पन्न होती है वैसे ही स्त्री-पुरुष दोनों के शरीर में विशेषकर पुरुष के शरीर में सेक्स हार्मोन और टेस्टोस्टोरॉन का रिसाव तेजी से होने लगता है। यह हार्मोन स्त्री-पुरुष के मन में कामुक भावनाओं को तेज करने के साथ-साथ जननेन्द्रियों में भी उत्तेजना लाकर उन्हें सेक्स क्रिया के लिए उत्तेजित करता है। इस तरह वैज्ञानिकों के अनुसार यह कहा जा सकता है कि सेक्स क्रिया को सही रूप में सम्पन्न करने का कार्य स्वस्थ संतुलित मस्तिष्क और टेस्टोस्टेरॉन हार्मोन की सही मात्रा पर निर्भर करता है।

 

 अनेक सेक्स वैज्ञानिकों का मानना है कि मनुष्य के अन्दर उत्पन्न सेक्स की भावना टेस्टोस्टोरॉन हार्मोन के स्राव पर निर्भर करती है। पिट्यूटरी ग्रंथि  में बनने वाले हार्मोन गोनेडोट्रफिन द्वारा उत्तेजित होने पर पुरुष अंडकोषों में सेक्स हार्मोन अर्थात टेस्टोस्टेरॉन का निर्माण तीव्र हो जाता है। टेस्टोस्टेरॉन हार्मोन ही हमारे शरीर में शुक्राणुओं की निर्माण की प्रक्रिया को शुरू करता है तथा सेक्स संबंधी लक्षणों को दर्शाता है। स्त्रियों के मुकाबले पुरुषों के शरीर में 10 गुना ज्यादा टेस्टोस्टोरॉन हार्मोन रहता है। इसके अलावा भी शरीर में कई अन्य रसायन भी होते हैं जो स्त्री-पुरुषों में सेक्स की भावनाएं उत्पन्न करने के लिए जिम्मेदार हैं।

वैज्ञानिकों के शोध से पता चला है कि स्त्री-पुरुष दोनों में आकर्षण, कामभावना, उत्तेजना और सेक्स क्रिया को चरम पर पहुंचने का कार्य शरीर में मौजूद टेस्टोस्टेरॉन, ऑक्सीटोसिन, वैसोप्रेसिन और फेनाइलेथैलामाइन नामक हार्मोन करते हैं। शरीर वैज्ञानिकों द्वारा इन हार्मोन का अध्ययन करने पर पता चला है कि स्त्री-पुरुष को एक-दूसरे की ओर आकर्षित करने का कार्य ऑक्सीटोसिन और वैसोप्रेसिन नामक हार्मोन करता है। इन हार्मोन का स्राव मस्तिष्क से जननांग की ओर तब अधिक तेज हो जाता है जब स्त्री-पुरुष एक-दूसरे को आलिंगन और चुंबन करते हैं।

सेक्स संबंधों के दौरान शरीर में चारों हार्मोन्स का कार्यः

 

ऑक्सीटोसिन हार्मोनः

शरीर वैज्ञानिकों द्वारा ऑक्सीटोसिन हार्मोन का शोध करने पर पता चला है कि शरीर में मौजूद यह हार्मोन एक गोंद की तरह होता है जो स्त्री-पुरुष को एक साथ रहने के लिए मन में लगाव पैदा करता जो एक-दूसरे की ओर आकर्षित होने के लिए मस्तिष्क को उत्तेजित करता है। ऑक्सीटोसिन नामक हार्मोन का मानव जीवन के लिए बेहद महत्व है क्योंकि स्त्रियों के स्तनों में दूध बनाने का कार्य भी इस हार्मोन के द्वारा ही होता है। सेक्स वैज्ञानिकों के अनुसार सेक्स क्रिया के बाद लिंग की उत्तेजना शांत होने पर उसे फिर से उत्तेजित करने का कार्य भी ऑक्सीटोसिन हार्मोन का होता है। इस विषय में शोध करने वालों का कहना है कि मादा जानवर भी उस नर जानवरों के साथ ही हॉटपीरियड में सेक्स संबंध बनाना पसंद करती हैं जिसमें ऑक्सीटोसिन का स्तर अधिक हो। ऑक्सीटोसिन का निर्माण पिट्युटरी ग्रंथि में होता है लेकिन कुछ शोध कार्यो में इसकी कुछ मात्रा मस्तिष्क की न्यूरॉन रचनाओं में देखी गयी है।

 

वैसोप्रेसिन हार्मोनः

वैसोप्रेसिन को ऑक्सीटोसिन हार्मोन का सहायक हार्मोन कहा जाता है। शरीर विज्ञान के अनुसार ऑक्सीटोसिन हार्मोन द्वारा शुरू किए गए कार्य को पूरा करने का कार्य वैसोप्रेसिन हार्मोन करता है। मनुष्य के शरीर में यही वह हार्मोन है जो स्त्री को पत्नी और पुरुष को पति होने का अहसास कराता है। जानवरों के शरीर में मौजूद यही हार्मोन अपनी साथी के चुनाव करने में मदद करता है।

फेनाइलेथैलामाइन हार्मोनः

वैज्ञानिकों के अनुसार हमारे शरीर में एक जैव सक्रिय रसायनिक हार्मोन होता है जिसे फेनाइलेथैलामाइन कहते हैं। शरीर में मौजूद यह रसायन ही हमारे मूड अर्थात इच्छाओं में बदलाव लाने का कार्य करता है। स्त्री-पुरुष के मन में सेक्स संबंध के लिए जो इच्छा और उत्तेजना उत्पन्न होती है वह भी फेनाइलेथैलामाइन हार्मोन के द्वारा ही होती है। सेक्स के दौरान स्त्री-पुरुष में उत्तेजना, कामुक भावना और उन्मादित सेक्स इच्छा को पैदा करने का कार्य भी फेनाइलेथैलामाइन हार्मोन करता है।

 

टेस्टोस्टेरॉन हार्मोनः

शरीर का अध्ययन करने वाले कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि टेस्टोस्टेरॉन हार्मोन का निर्माण व्यक्ति के शरीर में युवावस्था शुरू होने के साथ ही होने लगता है जबकि कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि टेस्टोस्टेरॉन हार्मोन का निर्माण गर्भ में ही होने लगता है जो युवावस्था की शुरुआत के समय इसकी कार्यशीलता तेज हो जाती है जिससे किशोर-किशोरियां देखते-देखते ही युवक-युवती में बदल जाते हैं।

शरीर विकास की बाते करें तो किशोरावस्था से युवावस्था में प्रवेश करने की प्रक्रिया 10 से 12 वर्ष की आयु से ही शुरू हो जाती है। इस आयु में हायपोथेलेमस और पिट्युटरी ग्रंथियां में विशेष प्रकार के हार्मोन उत्पन्न होने लगते हैं जिसे टेस्टोस्टेरॉन हार्मोन कहते हैं और इस हार्मोन से शरीर में यौनांगों का विकास होने लगता है। इस हार्मोन के विकास के कुछ समय बाद ही कुछ अन्य हार्मोन का भी निर्माण शुरू हो जाता है जो शरीर के विकास के क्रम को बढ़ा देता है। एक अध्ययन से पता चला है कि किशोरावस्था में लड़कों ने टेस्टोस्टेरॉन का स्तर लड़कियों की तुलना में 20 गुना अधिक रहता है। टेस्टोस्टेरॉन हार्मोन की उत्पत्ति लड़कों के अंडकोषों में होता है और लड़कियों के अधिवृक्क ग्रंथि में होता है।