महिलाओं को हासिल हैं कानूनी अधिकार

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family-members28002आज महिलाएं कामयाबी की बुलंदियों को छू रही हैं। हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा व क्षमता का लोहा मनवा रही हैं। इन सबके बावजूद उन पर होने वाले अन्याय, प्रत़ाडना, शोषण आदि में कोई कमी नही आई है और कई बार तो उन्हें अपने अधिकारों के बारे में जानकारी तक नही होती। आइए जानें महिलाओं के अधिकारों के विभिन्न पहलुओं के बारे में अधिवक्ताओं की राय-महिलाओं के कानूनी अधिकार घरेलू हिंसा (डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट 2005) शादीशुदा या अविवाहित स्त्रयां अपने साथ हो रहे अन्याय व प्रत़ाडना के खिलाफ घरेलू हिंसा कानून के अतंर्गत केस दर्ज कराकर उसी घर में रहने का अधिकार पा सकती हैं जिसमें वे रह रही हैं।

यदि किसी महिला की इच्छा के विरूद्ध उसके पैसे , शेयर्स या बैंक अकाउंट का इस्तेमाल किया जा रहा है तो इस कानून का इस्तेमाल करके वह इसे रोक सकती हैं।

इस कानून के अंतर्गत घर का बंटवारा कर महिला को उसी घर में रहने का अधिकार मिल जाता है और उसे प्रताडत करनेवालों को उससे बात तक करने की इजाजत नहीं दी जाती।

विवाहित होने की दशा में अपने बच्चो की कस्टडी और मानसिक/शारीरिक प्रत़ाडना का मुआवजा मांगने का अधिकार भी है।

घरेलू हिंसा में महिलाएं खुद पर हो रहे अत्याचार के लिए सीधे न्यायालय से गुहार लगा सकती है, इसके लिए वकील को लेकर जाना जरूरी नहीं है। अपनी समस्या के निदान के लिए पीडत महिला वकील, प्रोटेक्शन ऑफिसर और सर्विस प्रोवाइडर में से किसी एक को साथ ले जा सकती हैं और चाहे तो खुद ही अपना पक्ष रख सकती है।

भारतीय दंड संहिता 498-ए के तहत किसी शादीशुदा महिला को दहेज के लिए प्रताडित करना कानूनन अपराध है। अब दोषी को सजा के लिए कोर्ट में लाने या सजा की अवधि बढाकर आजीवन कर दी गई है।

हिंदू विवाह अधिनियम-1995 के तहत निम्न परिस्थितियों में कोई भी पत्नी अपने पति से तलाक ले सकती है। पहली पत्नी होने के बावजूद पति द्वारा दूसरी शादी करने पर, पति के सात साल तक लापता होने पर, मानसिक या शारीरिक रूप से प्रताडत करने पर, अवैध संबंध रखने पर, धर्म परिवर्तन करने पर, पति को गंभीर या लाइलाज बीमारी होने पर, यदि पति ने पत्नी को त्याग दिया हो और उन्हें अलग रहते हुए एक वर्ष से अधिक समय हो चुका हो तो।

यदि पति बच्चो की कस्टडी पाने के लिए कोर्ट में पत्नी से पहले याचिका दायर कर दे, तब भी महिला को बच्चो की कस्टडी प्राप्त करने का पूर्ण अधिकार है।

तलाक के बाद महिला को गुजारा भत्ता, स्त्री धन और बच्चो की कस्टडी पाने का अधिकार भी होता है, लेकिन इसका फैसला साक्ष्यों के आधार पर अदालत ही करती है।

पति की मृत्यु या तलाक होने की स्थिति में महिला अपने बच्चो का संरक्षक बनने का दावा कर सकती है।

भारतीय कानून के अनुसार, गर्भपात कराना अपराध की श्रेणी में आता है, लेकिन गर्भ की वजह से यदि महिला के स्वास्थ्य को खतरा हो तो वह गर्भपात करा सकती है। ऎसी स्थिति में उसका गर्भपात वैध माना जाएगा। साथ ही कोई व्यक्ति महिला की सहमति के बिना उसे गर्भपात के लिए बाध्य नहीं कर सकता। यदि वह ऎसा करता है तो महिला कानूनी दावा कर सकती है।

तलाक की याचिका पर एक शादीशुदा स्त्री हिंदू मैरिज एक्ट के सेक्शन-24 के तहत गुजारा भत्ता ले सकती है। तलाक लेने के निर्णय के बाद सेक्शन-25 के तहत परमानेंट एलिमनी लेने का प्रावधान भी है।विधवा महिलाएंयदि दूसरी शादी नहीं करतीं तो वे अपने ससुर से मेटेनेंस पाने का अधिकार रखती हैं। इतना ही नहीं, यदि पत्नी को दी गई रकम कम लगती है तो वह पति को अधिक खर्च देने के लिए बाध्य भी कर सकती है। गुजारे भत्ते का प्रावधान अडॉप्शन एंव मेंटेनेंस में भी है।

सी.आर.पी.सी. के सेक्शन 125 के अंतर्गत पत्नी को मेंटनेंस, जो कि भरण-पोषण के लिए आवश्यक है, का अधिकार मिला है। जिस तरह से हिंदू महिलाओं को ये तमाम अधिकार मिलें हैं, उसी तरह या उसके समकक्ष या समानान्तर अधिकार अन्य महिलाओं (जो हिंदू नहीं है) को भी उनके पर्सनल लॉ मे उपलब्ध हैं, जिनका उपयोग वे कर सकती हैं।

लिव इन रिलेशनशिप से जुडे अधिकार

लिव इन रिलेशनशिप में महिला पार्टनर को वही दर्जा प्राप्त है जो किसी विवाहित को मिलता है।

लिव इन रिलेशनशिप संबंधों के दौरान यदि पार्टनर अपनी जीवनशैली को मानसिक या शारीरिक प्रताडना दे तो पीडित महिला घरेलू हिंसा कानून की सहायता ले सकती हैं।

लिव इन रिलेशनशिप से पैदा हुई संतान वैध मानी जाएगी और उसे संपत्ति में हिस्सा पाने का अधिकार भी होगा।
पहली पत्नी के जीवित रहते हुए यदि कोई पुरूष दूसरी महिला से लिव इन रिलेशन रखता है तो दूसरी पत्नी को भी गुजारा भत्ता पाने का अधिकार है।

बच्चो से संबंधित अधिकार
प्रसव से पूर्व गर्भस्थ शिशु का लिंग परीक्षण करने वाले डाक्टर और गर्भपात कराने का दबाव बनानेवाले पति दोनों को ही अपराधी करार दिया जाएगा। लिंग परीक्षण करने वाले डाक्टर को 3 से 5 वर्ष का कारावास और 10 से 15 हजार रूपए का जुर्माना हो सकता है। लिंग परीक्षण का दबाव डालने वाले पति और रिश्तेदारों के लिए भी सजा का प्रावधान है।

हिंदू मैरिज एक्ट- 1955 के सेक्शन 26 के अनुसार, पत्नी अपने बच्चो की सुरक्षा, भरण-पोषण और शिक्षा के लिए भी आवेदन कर सकती है।

हिंदू अडॉप्शन एंड सक्सेशन एक्ट के तहत कोई भी वयस्क विवाहित या अविवाहित महिला बच्चो को गोद ले सकती है।
दाखिले के लिए स्कूल के फार्म में पिता का नाम लिखना अब अनिवार्य नहीं है। बच्चो की मां या पिता में से किसी भी एक अभिभावक का नाम लिखना ही पर्याप्त है।

जमीन जायदाद से जुडे अधिकार
विवाहिता हो या अविवाहित, महिलाओं को अपने पिता की संपत्ति में बराबर का हिस्सा पाने का हक है। इसके अलावा विधवा बहू अपने ससुर से गुजारा भत्ता व संपत्ति में हिस्सा पाने की भी हकदार है।

हिंदू मैरिज एक्ट-1955 के सेक्शन 27 के तहत पति और पत्नी दोनों की जितनी भी संपत्ति है, उसके बंटवारे की भी मांग पत्नी कर सकती है। इसके अलावा पत्नी के अपने “स्त्री-धन” पर भी उसका पूरा अधिकार रहता है।

हिंदू मैरिज एक्ट-1954 के तहत महिलाएं संपत्ति में बंटवांरे की मांग नहीं कर सकती थीं, लेकिन अब कोपार्सेनरी राइट के तहत उन्हें अपने दादाजी या अपने पुरखों द्वारा अर्जित संपत्ति में से भी अपना हिस्सा पाने का पूरा अधिकार है। यह कानून सभी राज्यों में लागू हो चुका है।