उज्जैयनी

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mahakalभूतभावन महामृत्युंजय तीनों लोक (आकाश, पाताल और मृत्युलोक ) के अधिपति बाबा महाकालेश्वर की पावन नगरी उज्जयनी जिसकी ख्याति कालजयी अर्थात जहाँ के स्मरण मात्र से ही काल पर विजय प्राप्त हो जाती है ऐसी नगरी के रूप में प्रसिद्ध है । पौराणिक मान्यताओं के अनुसार उज्जयनी सृष्टि की रचना केन्द्र भी है, प्रत्येक कल्प में सृष्टि का आरम्भ यही से होता है। मोक्षप्रदायिनी  माँ क्षिप्रा के सुरम्य तट पर बसी उज्जयनी के प्राण क्षिप्रा के कलकल निनाद से स्पंदित होते है । स्कन्द पुराण में क्षिप्रा के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा है कि –

नास्ति वत्स महिपृष्ठे सिप्रायाः सदृशी नदी । यस्यास्तीरे क्षणान्मुक्तिः किं चिरात्सवनेवौ ।

अर्थात पृथ्वी पर क्षिप्रा के समान अन्य कोई नदी नहीं है, इसके स्मरण मात्र से ही सारे पाप तो नष्ट होते ही है साथ ही पावन स्पर्श से मोक्ष प्राप्त कर मनुष्य अमरत्व को प्राप्त कर लेता है । इस प्रकार क्षिप्रा और बाबा महाकाल उज्जयनी के श्रृंगार है ।

पतित पावन माँ गंगा के समान ही माँ क्षिप्रा के स्नान का विशेष महत्व है शिव नगरी, तांत्रिक महत्व का स्थान, ज्योतिष और खगोलीय महत्व को दर्शाती यह नगरी अपने आप में सम्पूर्ण विश्व की धार्मिक राजधानी के रूप में प्रतित होती है । सम्पूर्ण विश्व को योग, कर्म, न्याय, सत्य, सेवा व आध्यात्म का मार्ग प्रशस्त करने वाले युग नायक योगिराज भगवान श्री कृष्ण ने ज्ञान का दिव्य प्रकाश इसी पुण्य नगरी में अपने गुरु  महर्षि सान्दीपन से प्राप्त किया, संसार के मानवों के अमंगल का हरण करने के लिए स्वयं ग्रहराज महामंगल ने पृथ्वी के गर्भ से इसी अवंतिका में जन्म लिया, भगवान महारुद्र के अवतार के रूप में स्वयं कालभैरव अपने ब्रह्महत्या के निवारण हेतु इसी पावन नगरी में बस गए । सनातन धर्म में उल्लेखित हमारे आराध्या सभी ३३ कोटि देवी – देवता इस भूमि पर आने को लालायित रहते हैं क्योकि वेदों में भी उल्लेखित है कि –

स्मशानमुषरं क्षेत्रपीठं तु वनमेवच । सीयते पानकं यत्र तेनेदं क्षेत्रमुच्चते ॥

यस्मात्स्थानं  च मातृणा पीठ तेनैव तत्स्मृतम् । मृतः पुनर्न जायेत तेदेनमूसरं स्मृतम ॥

गृहयमेतत प्रियं नित्यं क्षेत्र शंभोर्महात्मनः ॥ यस्मादिष्टम्  हि भूतानां स्मशानमति वल्ल्भम् ।

महाकालवन यच्च तया चैव विमुक्तिकम् ।

अर्थात – क्षेत्र  हैं  जहाँ पाप क्षय होता है, ‘ पीठ ‘ जहाँ मातृकाओं का निवास होता हैं ‘ उसर ‘ जहाँ पुनर्जन्म नहीं होता अर्थात क्षिप्रा जल स्नान से मोक्ष प्राप्ति होती है, ‘ वन ‘ जहाँ नित्य ही शिव का वास है तथा ‘श्मशान ‘ हैं  जहाँ भूतों का निवास हैं, इसलिए क्षिप्रा तट का यह स्थान ‘ गुहयवन ‘ कहा गया है । एक योजन तक महाकाल वन पवित्र स्थान बन गया है जहाँ शिव के सहस्त्र लिंग थे, देवी – देवताओं का वास था